बैंगलोर, कुछ अलग ही है ये शहर ! आम शहरों के जैसा सब कुछ यहाँ । चौड़ी सड़के, आने-जाने वालों को अलग रास्ता देने वाले सड़को के बीच के ‘डिवाइडर्स’ , वाहनों को यातायात के नियम सीखाने वाली स्वचलित रंग बदलने वाली बत्तियाँ , हर एक मील पर मॉल, उनमे में चमकती हुयी रोशनियों की चकाचौंध कर देने वाली लड़ियाँ , सड़को को किनारे करीने से बसी हुयी आधुनिक बस्तियाँ, बस्तियों में हर कदम पर साजो-सज्जा के सामानों से भरी पड़ी दुकाने और रोजमर्रा की सारी जरूरतों को एक ही जगह उपलब्ध कराने वाले ‘शौपिंग सेंटर्स’ । पर इन सब के बावजूद कुछ तो अलग है इसके अंदाज़ मे, इसके एहसास मे । शायद इसकी वजह है की यहाँ आम शहरों जैसा कोलाहल नही है, और न ही है किसी मरघट-सा सन्नाटा । यहाँ न किसी के लिए कोई परायापन है और न  ही है भावातिरेक से रुकी हुयी भावनाएँ । यह शहर हर किसी चीज़ का एक संतुलित मिश्रण सा मालूम पड़ता है । भारत के हर कोने से आये हुए लोग और उनकी वैचारिक विभिन्नता ने ही शायद इसकी संस्कृति को इस कदर ढाल दिया है । इस नयी संस्कृति को आत्मार्पित करते और अनजाने मे ही इसकी परिभाषा को नया मूल देते यहाँ को लोग भी इसके संवेग का एक हिस्सा बन चुके हैं । यह मिश्रण केवल लोगों तक ही सिमित होती तो कुछ खास न था, परन्तु यह परिवर्तन यहाँ की वेश-भूषा , खान-पान और रहन-सहन की भी पहचान बन चुकी है । अगर यहाँ कोई सूट-बूट पहने और माथे पर लम्बा तिलक लगाये हुए मिल जाये तो कोई आश्चर्य की बात न होगी । अंग्रेजी हिंदी और कन्नड़ बोलने वालों की भी संख्या वस्तुतः ज्यादा भले हो परन्तु अन्य भाषाविदों की गिनती को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता । भाषा और रहन-सहन के अलावा खान-पान का शौक रखने वालों के लिए भी यह जगह किसी उपहार से कम नही है । उत्तर और दक्षिण भारत के व्यंजनों की एक लम्बी कतार यहाँ की खाद्य-श्रृंखला के अंग हैं । इनमे से कई व्यंजन तो यहाँ की मिश्रित खान-पान के तरीकों की ही उपज है, जो अपनी मौलिकता को परे एक नए रूप में अद्वितीय हैं । यहाँ हर गली मे हर नुक्कड़ के हर ‘चाय स्टाल’ पर मिलने वाला ‘बटर-बन-समोसा’ इसका एक अनोखा उदाहरण मात्र है । यहाँ पाक-कलाविदों का भी कोई भौगोलिक दायरा नहीं है । कोई  उत्तर भारतीय मूल का होते हुए भी ‘डोसे’ बनाने मे कुशल होगा तो कोई अच्छा राजमा-चावल परोशने वाला शायद विंध्य-पर्वत के पीछे की दुनिया से अनभिज्ञ हो।  पाक-कला की विषमताओं में पले-बढ़े इस अंदाज़ को केवल जरुरत-आपूर्ति के दायरे में बांधकर देखना बेमानी होगी । यह अवश्य ही कहीं न कहीं यहाँ के लोगों की या यूँ कह ले की भारतीय संस्कृति की ‘आतिथ्य’ भावना को प्रतिबिंबित करती है । जिस तरह अनंत का कोई अंत परिभाषित नही है, उसी तरह ही है आतिथ्य की विवेचना भी । शायद इसिलिये ही खान-पान के साथ-साथ यहाँ के लोगों ने अपने घरों और दिलों के रास्ते भी अपने मेहमानों के लिए खोल रखे हैं । यहाँ के लगभग हर घर में लोगों ने मेहमान बसा रखे हैं । कहने को तो यह रिश्ता भी रुपये के लेन-देन पर टिका हुआ एक संधि मात्र ही है परन्तु यहाँ के लोगों का सरल व्यवहार और निःस्वार्थ सरोकार इस रिश्ते को कुछ नए आयाम देता है, जो इसे भौतिकता की पृष्ठभूमि पर रखते हुए भी इसकी परिभाषा मे आत्मीयता के अंश घोल देता है । बैंगलोर की इस प्रेम भरे अंदाज़ मे यहाँ के मौसम का भी महत्वपूर्ण योगदान है । अगहन की शाम का सा सुहाना और सावन की अगुवाई का सा निश्पक्ष मौसम अगर साल के बारहों महीने रहे तो चाहे वो किसी प्रेमिका के प्रेम में विभोर प्रेमी हो या फिर दिन भर मेहनत करने वाला कोई दिहाड़ी मजदूर, इसके प्रेम पाश से कोई अछूता न रह पायेगा । शायद इसी से मंत्र-मुग्ध, यहाँ के लोग मस्त रहा करते हैं । यहाँ लोग तो हैं पर भीड़ नही है, रफ़्तार तो है पर होड़ नही है , बातें तो हैं पर शोरे नहीं है । पर इसका मतलब यह कदापि नही है की यहाँ के लोग काम नही करते हैं । यहाँ लोग गुनगुनाते हुए भवरे की तरह व्यस्त हैं, बलखाते हुए बैल की तरह मस्त हैं, न चिड़ियों की झुण्ड की तरह नाहक चहचहाते और ना ही मवेशियों की तरह आदि काल से विचाराधीन । यहाँ घरों मकानों के बीच देवालय भी मौजूद हैं । पर यह झूठी श्रद्धा का दिखावा करते, अनवरत मंत्रोचारण करते पोंगे पंथियों का जमघट नहीं अपितु अराधना को अंगीकृत करने वाले कुछ भक्तों का समूह है । यहाँ मंदिरों में संगीत की धुन और धुप की खुशबू तो मिल जाएगी, परन्तु उनको स्वर देने वालों की टोह लेने के लिए मंदिर के किसी कोने में झांकना अवश्य पड़ जायेगा । मंदिरों के सामानांतर किसी भी शहर की पूर्णता को परलक्षित करने वाले ‘पार्क’ भी बंगलोर  के अभिन्न अंग हैं । इस शहर के युवा कर्म-दल को बराबर की टक्कर देने मे ये कदापि पीछे नही हैं । यह केवल ‘कॉलोनी’ के बीच में प्रेमी-युगलों के मिलने की जगह मात्र न बनकर शहर के स्वास्थ्य संवर्धन को नयी दिशा देते हैं । सुबह-शाम यहाँ वृद्ध दलो की कसरत करती मंडली से लेकर पारिवारिक इकाईयों की इठलाती कड़ियाँ दिख जाती हैं । इसके साथ-साथ इन पार्कों मे संरक्षित हरीतिमा शहर के वातावरण मे चार चाँद लगा देती है । समुद्र के किनारे न होने का भी इस शहर को कोई मलाल नही है । यहाँ की लम्बी और शांत झीलें अपनी मद्धम लहरों की गोद मे हवा को गीत सुनाती हुयी माहौल मे रुमानियत घोल देती हैं । ‘बोटिंग’ और ‘फिशिंग’ करने वालों के लिए यहाँ की झीलों को एक नायाब तोहफा ही समझा जा सकता है । इन सब चीज़ों के बावजूद बंगलोर अपने ही अंदाज़ मे अलग है । यहा सड़के चौड़ी है मगर रास्ते भी लम्बे है, इमारतें छोटी ही है मगर आसमान से गुफ्तगू करती है, लोग व्यस्त तो है मगर स्वावलम्बी हैं, झीलें शान्त हैं पर अनवरत हैं । इन्हे किसी से शिकायत नही है, कोई रोष नहीं है, होंठो पर मुस्कान है पर मन लालशा नहीं उम्मीद है । शायद इसीलिए यहा लोग वोट भी कम ही देते हैं, उन्हें खुद पर ही यकीन हो चला है । सही मायनो मे यही वो शहर है जिसका सपना हम भारत के रूप मे देखते है, जो सपना बापू ने देखा था । आधुनिकता की चादर ओढ़े और मानवता का कलश उठाये  एक आदर्श गाँव । 

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